रॉक इन चौक : पड़े पोल, खुदी हुई सड़क और उफनते सीवरेज-ब्लॉक के बीच उभरेगा स्वर ‘पधारो म्हारे देस’










हरीश बी. शर्मा
27 सितंबर। देश-दुनिया के लिए विश्व पर्यटन दिवस के रूप में मनाया जाने वाला एक दिन है। सो, बीकानेर में भी सैलानियों की मनुहार होगी। जूनागढ़ के पास ऊंट-घोड़े सजे मिलेंगे, जहां से कुछ ही दूर पर चलते हुए एक बहुत बड़ा खंभा डिवाइडर पर उठने के लिए इंतजार में पड़ा मिलेगा। इस पूरी सड़क पर किनारे-किनारे खड्डे मिलेंगे, जिन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रोड-शो के लिए बनाई गई बैरिकेडिंग के लिए खोदा गया था। पता नहीं, भाजपा ने रोड-कट के पैसे जमा करवाए या नहीं, ये जस-के-तस बने हुए हैंं। यहां से स्वागत होगा और फिर अगर सबकुछ सही नहीं रहा और कहीं से भी प्रेशर आया तो सीवरेज उफनते हुए मिलेंगे। सीवरेज का उफान और कचरा-कलेक्शन सेंटर की सड़ांध में से निकलते हुए पर्यटन विभाग के अधिकारियों, पर्यटन व्यवसायियों, गाइडों और लपकों के साथ रौबीलों के चेहरों पर चिपकाई हुई मुस्कान सैलानियों के हैप्पी-इंडैक्स में इजाफा करेगी। इस बीच धुन बजती रहेगी, ‘केसरिया बालम आओ नीं पधारो म्हारे देस…’


वैसे भी यह पहली बार नहीं हो रहा है। हर साल यह दिन आता है। विश्व पर्यटन दिवस मनाया जाता है। पहले-पहल जागरूक लोग जुड़े तो उन्होंने हवेलियों को बचाने की प्रशासन से प्रार्थना की। जन-जागरण अभियान चलाया। परिणाम, हवेलियां तेजी से बिकीं। अब हालात यह है कि ‘हजार हवेलियों’ वाले शहर में सौ हवेलियां गिनाने में भी तांण आए। पाटों को खूबसूरत बनाना था, जाने कहां बजट गया। बीकाजी की टेकरी को नयनाभिराम बनाना था, पैसा लगा, लेकिन आज भी यह उपेक्षित है। हालात यह कि बीकानेर में पर्यटकों का स्टे घटने लगा। एक दिन में जूनागढ़ और रामपुरिया हवेलियां सलटाई और डेजर्ट-सफारी के बहाने लपके सैलानियों को पहुंचा देते हैं सीधे जैसलमेर। बीकानेर टापता ही रह जाता है।
क्योंकि बीकानेर को पर्यटकों की दृष्टि से विकसित करने के लिए कुछ किया ही नहीं गया। न पब्लिक पार्क की सुध ली गई और न म्यूजियम की। अभिलेखागार तो सरकारी दफ्तर भर रह गया और लक्ष्मीनाथ मंदिर तक पर्यटकों को पहुंचाना आज भी प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती। पर्यटकों को लुभाने के लिए शुरू किए गए ऊंट-उत्सव की योजना भी सहायक निदेशक पर्यटन राजेंद्रसिंह शेखावत के आकस्मिक निधन के बाद जमीन पर आ गई। हर साल जगहें बदलती रही। आपाधापी होती रही। सारा आयोजन होटेलियर्स के भरोसे चलता रहा। न तो स्थानीय दर्शक जुड़े सके और न देशी-विदेशी पर्यटकों का इस उत्सव के प्रति रुझान बन सका।
शहर तो पूरी तरह से उपेक्षित ही रहा। यहां के मठ-मंदिर, बगेचियां-तालाब और पाटा और चायपट्टी तक तो सैलानियों को लाने के लिए किसी ने प्रयास ही नहीं किया, लेकिन इन सभी के नाम पर पैसा खूब लगया। शहर की भोली जनता को तो यह भी नहीं पता कि पर्यटन के नाम पर चौक-संस्कृति के विकास के लिए प्रशासन के पास कितनी योजना कैसे-कैसे क्रियान्वित हुई।
इस दिन देश में सैलानियों की आवभगत के लिए ढोल-मजीरे बजाए जाते हैं ताकि वे खुश हो सकें। खुश होंगे तो होटल वालों की इनकम बढ़ेगी। लपकों को कमीशन मिलेगा। बाजार में हलचल होगी। बाकी इन सैलानियों के आने से किसी का कुछ होना-जाना नहीं है। हमारे इधर सैलानियों का अर्थ अंग्रेज ही हैं। अंग्रेजों की मतलब गोरे। गोरों को मनुहार होती है।
इन सभी से बेपरहवा चौक के पाटों पर माहौल रॉक है। सीधी बात है, जो चंदे-चि_े करेंगे। हराम की खाएंगे, उन्हें भुगतना होगा। यह शहर ऐसे ही लोगों का है। विरोध नहीं करता, लेकिन साथ खड़ा नहीं होता। देख लेना कल पर्यटन दिवस मनाया जाएगा तो कितने लोग होंगे।

