Bikaner: सात साल तक अनाज मंडियों में किसानों की जगह…..










बीकानेर प्रदेश की 171 कृषि उपज मंडी समितियों में किसान की उपज की खरीद-फरोख्त का कारोबार होता है। जिन किसानों के बलबूते मंडियां सालाना करीब 700 करोड़ रुपए का राजस्व सरकार को देती है, उनका ही प्रतिनिधित्व नहीं है।प्रदेश की सभी मंडियों में राज्य सरकार ने सात साल से अफसरों को प्रशासक लगाकर अपने कब्जे में ले रखा है।
जबकि इनमें किसानों के सदस्यों वाला निर्वाचित बोर्ड और अध्यक्ष होते हैं। इनके चुनाव सात साल से नहीं कराए गए हैं। जिसके चलते प्रशासक के तौर पर अधिकारी को अध्यक्ष की शक्तियां दे रखी है। अनाज मंडियों में लोकतांत्रिक व्यवस्था से चुने किसान, मजदूर, व्यापारी प्रतिनिधियों के बोर्ड के हाथ में व्यवस्था होती है। बोर्ड नहीं होने से सबसे ज्यादा खामियाजा प्रदेश के लाखों किसानों को भुगतना पड़ रहा है। निर्वाचित किसान प्रतिनिधि (बोर्ड सदस्य) नहीं होने से उनकी आवाज कोई नहीं उठाता। इस व्यवस्था से व्यापारियों और मंडी श्रमिकों के अधिकारों पर भी कुठाराघात हो रहा है। इनके प्रतिनिधि भी बोर्ड में शामिल होते हैं।
प्रदेश में कृषि उपज मंडी समितियों के बोर्ड सदस्यों और अध्यक्षों के अंतिम बार चुनाव 26 सितम्बर 2011 को हुए थे। तब प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी और सभी श्रेणी की अनाज उपज मंडियों की संख्या 142 थी। इन निर्वाचित बोर्ड और अध्यक्षों का कार्यकाल 25 सितम्बर 2016 में पूरा हो गया। उस समय प्रदेश में भाजपा की सरकार आ चुकी थी। भाजपा सरकार ने कार्यकाल के अंतिम दो साल में चुनाव नहीं कराए और साल 2018 के विधानसभा चुनाव में पार्टी सत्ता से बाहर हो गई। इसके बाद कांग्रेस की सरकार बनी लेकिन, पांच साल के कार्यकाल में कांग्रेस ने भी चुनाव नहीं कराए। हालांकि इस दौरान 29 नई कृषि उपज मंडी समिति खोली गई। ऐसे में इनमें पहले अध्यक्ष को राज्य सरकार ने मनोनीत किया। अब फिर भाजपा की सरकार प्रदेश में बन चुकी है।
ए क्लास अनाज मंडी में 17 सदस्यों का बोर्ड होता है। जो अध्यक्ष व उपाध्यक्ष का निर्वाचन करते हैं। यह बोर्ड ही मंडी प्रशासन के साथ मिलकर अनाज मंडी के विकास, वित्तीय और अन्य निर्णय करते हैं। बोर्ड में किसानों के आठ निर्वाचित सदस्य होते हैं। साथ ही स्थानीय विधायक, व्यापारियों के दो सदस्य, तुलाईदार या मंडी श्रमिकों का एक सदस्य, सहकारी विपणन सोसायटी का एक सदस्य होता है। राज्य सरकार दो सदस्यों को मनोनीत करती है। संबंधित स्थानीय निकाय का एक सदस्य भी बोर्ड में शामिल रहता है। अध्यक्ष पद के लिए आरक्षण की व्यवस्था है
पिछली कांग्रेस सरकार के समय नवगठित 29 कृषि उपज मंडी समितियों में अध्यक्ष को सरकार ने मनोनीत किया था। बोर्ड का बिना निर्वाचन बनाए इन अध्यक्षों को भाजपा सरकार ने सत्ता संभालते ही हटा दिया। यानि प्रदेश में 171 मंडियों में अब कोई भी निर्वाचित या मनोनीत अध्यक्ष नहीं है।
500 से 700 करोड़का राजस्व
प्रदेश की कृषि उपज मंडी समितियां राज्य सरकार को 500 से 700 करोड़ रुपए सालाना राजस्व दे रही है। वित्तीय वर्ष 2019-20 में 665 करोड़ रुपए का राजस्व प्राप्त हुआ था। इसके बाद 2020-21 में केन्द्रीय कृषि एवं विपणन संबंधी कानून बनने के बाद राजस्व गिरकर 562 करोड़ रह गया। अब चालू वित्तीय वर्ष में 700 करोड़ रहने का अनुमान है।

