NGT ने अरावली जंगल की नीलामी पर उठाए सवाल, हरियाणा सरकार को भेजा नोटिस


अरावली की पहाड़ियों के संरक्षित जंगल की नीलामी को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने कड़ी आपत्ति जताई है। इस घटना पर NGT ने स्वतः संज्ञान लेते हुए हरियाणा सरकार और अन्य संबंधित विभागों को नोटिस जारी किया है। पर्यावरण संरक्षण और वन संरक्षण कानूनों का उल्लंघन होने की बात सामने आई है, जिसके बाद यह मामला गंभीर हो गया है। आखिर क्या है पूरा मामला और कैसे जंगल को संरक्षित घोषित करने के बावजूद उसकी नीलामी कर दी गई?

पूरा मामला:
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने The Times of India की एक रिपोर्ट पर स्वतः संज्ञान लिया, जिसमें हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के राजावास गांव के 506 एकड़ अरावली क्षेत्र को संरक्षित वन घोषित किए जाने के बावजूद 119.5 एकड़ भूमि की नीलामी की खबर दी गई थी। यह नीलामी हरियाणा सरकार के खान विभाग द्वारा 20 जुलाई 2023 को की गई थी, जबकि उसी दिन इस भूमि को वन संरक्षण अधिनियम, 1980 (FCA) के तहत संरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया था।

रिपोर्ट के अनुसार, नीलामी के बाद एक कंपनी ने बोली जीत ली और उसे 10 साल की खनन पट्टा मिल गई, जिसमें तीन स्टोन क्रशर लगाने और प्रति वर्ष 1.4 मेट्रिक टन खनन करने की अनुमति दी गई। इसके बावजूद, इस नीलामी के लिए हरियाणा के वन विभाग से कोई अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) नहीं लिया गया था, जो कि वन संरक्षण अधिनियम और पर्यावरण संरक्षण अधिनियम (EPA) के तहत आवश्यक है।

मामले के कानूनी पहलू:
NGT ने इस मामले को गंभीरता से लिया और इसे वन संरक्षण अधिनियम, 1980 और पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के उल्लंघन का मामला बताया। NGT की चेयरपर्सन जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव की अगुवाई में गठित बेंच ने हरियाणा सरकार के प्रधान मुख्य वन संरक्षक, हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (HSPCB), केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) और महेंद्रगढ़ के जिलाधिकारी को नोटिस जारी किया है।

NGT का यह कदम दर्शाता है कि कैसे पर्यावरण कानूनों की अनदेखी करके खनन कार्यों को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। मामले की सुनवाई अब 28 जनवरी 2025 को निर्धारित की गई है, और संबंधित विभागों से अगले सुनवाई से कम से कम एक सप्ताह पहले अपने हलफनामे दाखिल करने का निर्देश दिया गया है।

पर्यावरणीय प्रभाव और भविष्य की चिंता:
यह मामला सिर्फ कानूनी उल्लंघन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके व्यापक पर्यावरणीय प्रभाव भी हो सकते हैं। अरावली की पहाड़ियां हरियाणा और राजस्थान के लिए प्राकृतिक बफर के रूप में काम करती हैं और इस क्षेत्र में खनन गतिविधियों का विस्तार गंभीर पर्यावरणीय दुष्प्रभाव पैदा कर सकता है। वन क्षेत्र का संरक्षित होने के बावजूद नीलामी कर देना पर्यावरणीय संरचनाओं को कमजोर कर सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अरावली पहाड़ियों में खनन से न केवल वायु प्रदूषण बढ़ता है, बल्कि यह दिल्ली-NCR में पानी के संकट को भी बढ़ावा देता है, क्योंकि यह क्षेत्र जल संरक्षण के लिहाज से महत्वपूर्ण है।

सरकार की प्रतिक्रिया और जिम्मेदारी:
हरियाणा सरकार के खान विभाग ने इस नीलामी को लेकर अनभिज्ञता जताई, जिसमें उन्होंने यह दावा किया कि उन्हें 20 जुलाई 2023 को हुए संरक्षित वन क्षेत्र की अधिसूचना की जानकारी नहीं थी। दूसरी ओर, वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि बिना NOC के खनन कार्यों को शुरू नहीं किया जा सकता था।

यह स्पष्ट है कि सरकार के अलग-अलग विभागों के बीच संवादहीनता और पारदर्शिता की कमी इस गंभीर स्थिति के लिए जिम्मेदार है। NGT का यह कदम इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए एक कड़ा संदेश हो सकता है।

न्यायिक प्रक्रिया और उम्मीदें:
यह मामला पर्यावरण और वन संरक्षण के संदर्भ में एक मिसाल साबित हो सकता है, क्योंकि NGT ने साफ तौर पर कहा है कि इस मामले में पर्यावरण संरक्षण कानूनों का पालन नहीं किया गया। उम्मीद की जा रही है कि जनवरी 2025 की सुनवाई में सभी संबंधित पक्ष अपना पक्ष स्पष्ट करेंगे और इस मुद्दे का समाधान ढूंढ़ा जाएगा।

यह घटना सरकार की नीतियों में सुधार की जरूरत को भी रेखांकित करती है, ताकि भविष्य में इस तरह की खामियां और विवाद उत्पन्न न हो।


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