सुप्रीम कोर्ट ने खनिजों पर राज्य कराधान की पुनर्विचार याचिकाएं की खारिज, रॉयल्टी टैक्स नहीं- अदालत का बड़ा फैसला


सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण मामले में पुनर्विचार याचिकाओं को खारिज कर दिया है, जिसमें यह निर्णय लिया गया था कि राज्य सरकारें खनिज संपन्न भूमि पर कर लगाने की शक्ति रखती हैं और खनिजों पर दी जाने वाली रॉयल्टी टैक्स नहीं मानी जाएगी। इस फैसले ने खनिजों पर राज्य कराधान के अधिकार को स्पष्ट करते हुए एक बार फिर केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति संतुलन पर रोशनी डाली है। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने इस फैसले पर असहमति जताते हुए कहा कि रॉयल्टी को कर माना जाना चाहिए। आइए, इस मामले के विस्तृत पहलुओं पर एक नजर डालते हैं।

मामले की पृष्ठभूमि:
इस मामले का केंद्र बिंदु खनिजों और खदानों पर राज्य और केंद्र सरकार के अधिकारों से संबंधित है। 25 जुलाई 2024 को सुप्रीम कोर्ट की 9-न्यायाधीशों की पीठ ने बहुमत से फैसला सुनाया था कि राज्य सरकारों के पास खनिज अधिकारों पर कर लगाने की शक्ति है, जबकि रॉयल्टी को कर नहीं माना जाएगा। इस फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल की गई थी, जिसे 5 अक्टूबर 2024 को सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने खारिज कर दिया।

मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली पीठ ने यह कहा कि इस मामले में पुनर्विचार की कोई गुंजाइश नहीं है, क्योंकि फैसले में कोई स्पष्ट त्रुटि नहीं है। जबकि न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने बहुमत के इस फैसले से असहमति जताते हुए कहा कि रॉयल्टी एक प्रकार का कर है और इस पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए।

रॉयल्टी और कर का अंतर:
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि रॉयल्टी एक अनुबंधात्मक भुगतान है, जो खनिज पट्टेदार द्वारा सरकार को उसकी खनिज संपदा के उपयोग के बदले में दी जाती है। इसे कर नहीं कहा जा सकता क्योंकि यह पट्टे की शर्तों के अनुसार दी जाने वाली रकम है। अदालत ने यह भी कहा कि खनिज अधिकारों पर कर लगाने का अधिकार राज्य सरकारों के पास है, जबकि संसद को इस पर कर लगाने का अधिकार नहीं है।

न्यायमूर्ति नागरत्ना का असहमति पत्र:
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना, जो बहुमत से अलग मत रखती हैं, ने कहा कि रॉयल्टी वास्तव में कर के समान होती है। उनका मानना था कि खनिज और खानों पर कराधान की शक्ति केंद्र सरकार के पास होनी चाहिए, क्योंकि यह एक राष्ट्रीय संसाधन है और राज्यों के बीच असमानता उत्पन्न हो सकती है। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि राज्यों को खनिज कर लगाने की शक्ति देना देश की संघीय संरचना को कमजोर कर सकता है और इससे राज्यों के बीच अनुचित प्रतिस्पर्धा उत्पन्न हो सकती है।

केस की संवैधानिक धारा:
इस मामले में मुख्य रूप से भारतीय संविधान की सूची 1 की प्रविष्टि 54 और सूची 2 की प्रविष्टि 50 पर बहस हुई। सूची 1 में संसद को खनिज अधिकारों पर कर लगाने का अधिकार दिया गया है, जबकि सूची 2 के अनुसार राज्य सरकारें खनिज अधिकारों पर कर लगा सकती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि राज्य सरकारें खनिज अधिकारों पर कर लगाने का अधिकार रखती हैं, और संसद का इस मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं हो सकता।

अगस्त 2024 के फैसले का प्रभाव:
सुप्रीम कोर्ट ने अपने पिछले फैसले में यह भी स्पष्ट किया था कि यह निर्णय 1 अप्रैल 2005 से लागू होगा और राज्य सरकारें खनिज पट्टेदारों और केंद्र से लंबित रॉयल्टी और कर वसूल सकती हैं। हालांकि, 2026 तक इसे धीरे-धीरे वसूला जाएगा और इसमें किसी प्रकार का ब्याज या जुर्माना नहीं लगाया जाएगा। इस फैसले ने राज्यों को अपने खनिज संसाधनों पर कराधान का अधिकार दिया, जो कि एक महत्वपूर्ण वित्तीय स्रोत है।

सरकार की प्रतिक्रिया:
केंद्र सरकार ने इस फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल की थी, जिसमें यह तर्क दिया गया था कि इस फैसले में कुछ स्पष्ट त्रुटियां हैं। केंद्र का मानना था कि यह फैसला राज्यों और केंद्र के बीच शक्ति संतुलन को बिगाड़ सकता है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की बहुमत पीठ ने इस पुनर्विचार याचिका को खारिज करते हुए कहा कि फैसले में कोई त्रुटि नहीं है और इसे चुनौती देने की कोई गुंजाइश नहीं है।

संभावित प्रभाव:
इस फैसले का देश की संघीय संरचना और खनिज संसाधनों पर कराधान के अधिकार पर बड़ा प्रभाव पड़ेगा। राज्य सरकारें अब खनिज पट्टेदारों से रॉयल्टी और कर वसूल कर सकती हैं, जो उन्हें महत्वपूर्ण राजस्व प्रदान करेगा। हालांकि, न्यायमूर्ति नागरत्ना की असहमति ने इस पर एक अलग दृष्टिकोण पेश किया है, जिसमें संघीय संरचना की मजबूती पर जोर दिया गया है।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला राज्यों के खनिज संसाधनों के अधिकारों और कराधान की शक्ति को मजबूत करता है, लेकिन यह भी देखना होगा कि केंद्र और राज्य सरकारें इस फैसले के बाद कैसे संतुलन बनाती हैं।


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